Gangaur – Gauri Tritiya Vrat Puja Date

Gangaur (गणगौर) is one of the most popular, colourful and important festival for people of Rajasthan and it is celebrated throughout the state with great fervour and devotion. Gangaur is also known as Gauri Tritiya. It is also celebrated in some parts of Gujarat, West Bengal and Madhya Pradesh. The festival is held in the month of ‘Chaitra’ as per the Hindu calendar. The festival rituals commence the day after Holi and is celebrated for 18 days. Also, it marks the end of winter season and the coming of spring season.

In the word Gangaur, ‘Gan’ is the synonym for Lord Shiva whereas ‘Gaur’ stands for Gauri or Goddess Parvati who symbolizes Saubhagya (marital bliss). The unmarried women worship her for being blessed with a good husband, while married women do so for the welfare, health and long life of their husbands and for a happy married life.

Women and girls observe fast during this festive time and eat only once in a day. Images of Gauri and Isar (Lord Shiva) are made with the clay and decorated very beautifully. On the other hand, in some of the Rajput families, images are made of wood every year before the festival they are painted by the famous painters who are called as ‘Matherans’.

Gangaur – Gauri Tritiya Dates and Timings

Date Timings
30th March 2017, (Thursday) Tritiya Tithi Begins = 02:46 am on 30/Mar/2017
Tritiya Tithi Ends = 11:42 pm on 30/Mar/2017
20th March 2018, (Tuesday) Tritiya Tithi Begins = 05:53 pm on 19/Mar/2018
Tritiya Tithi Ends = 04:50 pm on 20/Mar/2018
8th April 2019, (Monday) Tritiya Tithi Begins = 04:01 pm on 7/Apr/2019
Tritiya Tithi Ends = 04:15 pm on 8/Apr/2019
27th March 2020, (Friday) Tritiya Tithi Begins = 07:52 pm on 26/Mar/2020
Tritiya Tithi Ends = 10:11 pm on 27/Mar/2020

गणगौर व्रत पूजा विधि – Gangaur – Gauri Tritiya Vrat Puja

  • चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान करके गीले वस्त्रों में ही रहकर घर के ही किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोना चाहिए.
  • इस दिन से विसर्जन तक व्रती को एकासना (एक समय भोजन) रखना चाहिए.
  • इन जवारों को ही देवी गौरी और शिव या ईसर का रूप माना जाता है.
  • जब तक गौरीजी का विसर्जन नहीं हो जाता (करीब आठ दिन) तब तक प्रतिदिन दोनों समय गौरीजी की विधि-विधान से पूजा कर उन्हें भोग लगाना चाहिए.
  • गौरी, उमा, लतिका, सुभागा, भगमालिनी, मनोकामना, भवानी, कामदा, भोग वर्द्विनी और अम्बिक. मां गौरी के सभी रुपों की पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से पूजा करनी चाहिए.
  • इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को दिन में केवल एक बार ही दूध पीकर इस व्रत को करना चाहिए. – गौरीजी की इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएं जैसे कांच की चूड़ियां, सिंदूर, महावर, मेहंदी, टीका, बिंदी, कंघी, शीशा, काजल आदि चढ़ाई जाती हैं.
  • सुहाग की सामग्री को चंदन, अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्यादि से विधिपूर्वक पूजन कर गौरी को अर्पण किया जाता है.
  • इसके पश्चात गौरीजी को भोग लगाया जाता है और भोग के बाद गौरीजी की कथा कही जाती है.
  • कथा सुनने के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से विवाहित स्त्रियों को अपनी मांग भरनी चाहिए.
  • चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) को गौरीजी को किसी नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर उन्हें स्नान कराएं.
  • चैत्र शुक्ल तृतीया को भी गौरी-शिव को स्नान कराकर, उन्हें सुंदर वस्त्राभूषण पहनाकर डोल या पालने में बिठाएं.
  • इसी दिन शाम को एक शोभायात्रा के रूप में गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसर्जित करें.
  • विसर्जन के बाद इसी दिन शाम को उपवास भी खोला जाता है.
  • पूजन में मां गौरी के दस रुपों की पूजा की जाती है. मां गौरी के दस रुप इस प्रकार है.
  • इस व्रत को करने से उपवासक के घर में संतान, सुख और समृ्द्धि की वृ्द्धि होती है.
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